ईसाई और मुस्लिम भी वैष्णव, भक्त हैं, क्योंकि वे भगवान की प्रार्थना करते हैं. वे कहते हैं कि “हे भगवान, हमें हमारा दैनिक भोजन दो”. हो सकता है ऐसी प्रार्थना करने वालों को अधिक जानकारी न हो और वह बहुत निचले पायदान पर हों, लेकिन यह एक शुरुआत है, क्योंकि वे भगवान तक पहुँचे हैं. किसी चर्च या मस्जिद में जाना भी पवित्र है (चतुर्-विधा भजंते मम जानः सुकृतिनोर्जुना). इसलिए जो इस प्रकार से शुरुआत करते हैं एक दिन विशुद्ध वैष्णव बन जाएंगे. लेकिन नास्तिकों का यह कुप्रचार मानव समाज के लिए बहुत संकटकारी है कि किसी चर्च, मंदिर, या मस्जिद में नहीं जाना चाहिए. हो सकता है कि कोई बहुत अग्रणी न हो, लेकिन व्यक्ति को कम से कम भगवान को समझने के लिए कुछ करना चाहिए. एक बच्चे को विद्यालय भेजा जाता है, और हालाँकि वह केवल अ आ इ ई सीख रहा हो, यदि वह रुचि रखता है तो एक दिन वह बहुत अच्छा विद्वान बन सकता है. समान रूप से, एक पवित्र व्यक्ति किसी दिन एक विशुद्ध भक्त बन सकता है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “रानी कुंती की शिक्षाएँ”, पृष्ठ 146

(Visited 20 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •