किसी जीव की गतिविधियाँ उसके जीवन के भिन्न चरणों में भिन्न होती है. एक अवस्था को जागृति, या जागृति का जीवन, और दूसरे को स्वप्न या स्वप्न का जीवन कहा जाता है. एक अन्य अवस्था को सुषुप्ति कहा जाता है, या अचेतन अवस्था में जीवन, और मृत्यु के बाद भी एक और अवस्था होती है. पिछले श्लोक में जागृति के जीवन का वर्णन किया गया था; अर्थात्, पुरुष और महिला विवाहित थे और उन्होंने एक सौ साल तक जीवन का आनंद लिया. इस श्लोक में स्वप्न अवस्था में जीवन का वर्णन किया गया है, क्योंकि पुरंजन ने जो गतिविधियाँ दिन के समय प्राप्त की थीं वे रात में स्वप्न अवस्था में भी प्रतिबिंबित हुईं. पुरंजन इंद्रिय भोग के लिए अपनी पत्नी के साथ रहते थे, और रात में इस भावना का आन्द अलग-अलग तरीकों से भोगा जाता था. एक पुरुष बहुत थका होने पर गहरी नींद में सोता है, और जब एक संपन्न व्यक्ति बहुत थक जाता है तो वह अपने उद्यान में कई स्त्री सखियों के साथ जाता है और वहाँ जल में प्रवेश करके संगति का आनंद लेता है. भौतिक संसार में प्राणियों की प्रवत्ति ऐसी ही है. कोई भी जीव किसी एक स्त्री के साथ संतुष्ट नहीं होता, जब तक कि उसे ब्रम्हचर्य की प्रणाली में प्रशिक्षित न किया जाए. सामान्यतः एक पुरुष की प्रवृत्ति कई स्त्रियों को भोगने की होती है, और यहाँ तक कि जीवन के अंत में भी काम का आवेग इतना तीव्र होता है कि बहुत वृद्ध होने पर भी वह युवा कन्याओं की संगति चाहता है. इस प्रकार प्रबल काम आवेग के कारण जीव इस भौतिक संसार में अधिक से अधिक लिप्त होते जाते हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", चौथा सर्ग, अध्याय 25 - पाठ 44
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