सभी पापमय कृत्यों में किसी शुद्ध भक्त, या वैष्णव के प्रति अपराध सबसे गंभीर होता है. किसी वैष्णव के चरण कमलों में किया गया अपराध इतना विनाशक होता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसकी तुलना एक मदमस्त हाथी से की है जो किसी वाटिका में घुस कर पेड़ पौधों को उखाड़ कर अफरा-तफरी मचा देता है. यदि कोई किसी ब्राम्हण या वैष्णव के चरण कमलों का अपराधी है, तो उसका अपराध उसके सभी मंगल कर्मों को उखाड़ फेंकता है. इसलिए व्यक्ति को वैष्णव-अपराध करने या किसी वैष्णव के चरण कमलों में अपराध करने से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए. यहाँ भगवान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यद्यपि हिरण्यकश्यप ने भगवान ब्रह्मा से आशीर्वाद प्राप्त किया था, लेकिन जैसे ही उसने प्रह्लाद महाराज, स्वयं अपने पुत्र के चरण कमलों में अपराध किया, ये आशीर्वाद निष्क्रिय हो जाने वाले थे. प्रह्लाद महाराज जैसे एक वैष्णव का वर्णन यहाँ निर्वैर, जिसका कोई शत्रु न हो, के रूप में किया गया है. श्रीमद-भागवतम (3.25.21) में अन्यत्र कहा गया है, अजात-शत्रवः संतह साध्वः साधुभूषणः: भक्त का कोई शत्रु नहीं होता है, वह शांत होता है, वह शास्त्रों का पालन करता है, और उसके सभी गुण उदात्त होते हैं. एक भक्त किसी को भी शत्रु नहीं बनाता है, किंतु यदि कोई उसका शत्रु बनता है, तो वह व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व के द्वारा परास्त कर दिया जाता है, भले ही अन्य स्रोतों से उसे कितने ही आशीर्वाद प्राप्त हों. हिरण्यकश्यपु निश्चित रूप से अपनी तपस्या का फल भोग रहा था, लेकिन यहाँ भगवान कहते हैं कि जैसे ही उसने प्रह्लाद महाराज के चरण कमलों में अपराध किया, वह विनष्ट हो जाएगा. व्यक्ति की आयु, वैभव, सौंदर्य, शिक्षा और जो कुछ भी उसके पास उसके पवित्र कर्मों के परिणामस्वरूप है वह उसे नहीं बचा सकता यदि उसने किसी वैष्णव के चरण कमलों में कोई अपराध किया हो. व्यक्ति के पास चाहे जो भी हो, यदि वह किसी वैष्णव के चरण कमलों में कोई अपराध करता है तो वह नष्ट हो जाएगा.

 

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, सातवाँ सर्ग, अध्याय 4 – पाठ 4 व 18

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