स्वयं को बचाने के लिए, व्यक्ति को शुद्ध भक्त की शरण लेनी चाहिए. नरोत्तम दास ठाकुर इसीलिए कहते हैं, चढ़िया वैष्णव-सेवा निस्तार पायेचे केबा. यदि व्यक्ति भौतिक प्रकृति के दुष्प्रभावों से स्वयं को बचाना चाहता है, जो भौतिक शरीर के कारण उपजते हैं, तो व्यक्ति को कृष्ण चैतन्य बनना होगा और कृष्ण को पूर्णता से समझने का प्रयास करना होगा. व्यक्ति को कृष्ण को सत्य में समझना चाहए, और व्यक्ति ऐसा किसी शु्द्ध भक्त की सेवा द्वारा ही कर सकता है. इसलिए प्रह्लाद महाराज प्रार्थना करते हैं कि भगवान नृसिंहदेव उन्हें भौतिक एश्वर्य प्रदान करने के स्थान पर किसी शुद्ध भक्त और सेवक के संपर्क में रखें. इस भौतिक संसार में प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को प्रह्लाद महाराज का अनुसरण करना चाहिए. महाजनो येन गतः स पंथः. प्रह्लाद महाराज अपने पिता द्वारा छोड़ी गई संपदा का भोग नहीं करना चाहते थे; बल्कि, वे भगवान के सेवक का सेवक बनना चाहते थे. भ्रममय मानव समाज जो हमेशा भौतिक उन्नति के माध्यम से प्रसन्नता प्राप्ति का प्रयास करता है, उसे प्रह्लाद महाराज और उनका कड़ाई से अनुसरण करने वालों द्वारा अस्वीकृत किया जाता है. विभिन्न प्रकार के भौतिक एश्वर्य होते हैं, जिन्हें तकनीकी रूप से भुक्ति, मुक्ति और सिद्धि के रूप में जाना जाता है. भुक्ति का तात्पर्य बहुत अच्छी स्थिति में स्थित होना है, जैसे उच्चतर ग्रह मंडलों में देवताओं के साथ होना, जहाँ व्यक्ति महानतम सीमा तक भौतिक इंद्रिय तुष्टि का भोग कर सके. मुक्ति का तात्पर्य भौतिक प्रगति से विरुचित होना और इस प्रकार परम के साथ एक हो जाने की इच्छा रखना. सिद्धि का तात्पर्य आठ प्रकार की सिद्धियाँ (अणिमा, लघिमा, महिमा इत्यादि) प्राप्त करने के लिए गंभीर प्रकार का ध्यान निष्पादित करना, जैसे योगी करते हैं. वे सभी जो भुक्ति, मुक्ति, या सिद्धि के माध्यम से कोई भौतिक प्रगति चाहते हैं, कालांतर में दंड के योग्य होते हैं, और वे भौतिक कर्मों की ओर ही लौटते हैं. प्रह्लाद महाराज ने उन सभी का त्याग किया; वे बस किसी शुद्ध भक्त के मार्गदर्शन में एक प्रशिक्षु के रूप में रत होना चाहते थे.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 09- पाठ 24

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