जैसे व्यक्ति वैदिक साहित्य के संदर्भ के माध्यम से विभिन्न सहस्त्राब्दियों के लिए विभिन्न अवतारों को समझ सकता है, उसी प्रकार वह यह समझ सकता है कि इस कलियुग में परम भगवान का वास्तविक अवतार कौन है. इस प्रकार से भगवान ने अधिकृत शास्त्रों के संदर्भ पर विशेष रूप से बल दिया है. दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को अस्थिरता से किसी ऐसे व्यक्ति को एक अवतार के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए बल्कि शास्त्रों का अध्ययन करके किसी अवतार के लक्षणों को समझने का प्रयास करना चाहिए. परम भगवान का अवतार कभी भी स्वयं को अवतार घोषित नहीं करता, बल्कि उसके अनुयायियों को अधिकृत शास्त्रों के संदर्भ से यह तय करना चाहिए कि अवतार कौन है और कौन ढोंगी है. कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति दो विशेषताओं द्वारा किसी अवतार के लक्षण समझ सकता है — मुख्य विशेषता, जिसे व्यक्तित्व कहते हैं, और गौण विशेषताएँ. शास्त्रों में किसी अवतार के शरीर और गतिविधियों के गुणों का वर्णन मिलता है, और शरीर का वर्णन वह मुख्य विशेषता होती है जिसके द्वारा किसी अवतार को पहचाना जा सकता है. अवतार की गतिविधियाँ गौण विशेषताएँ होती है. इसकी पुष्टि श्रीमद्-भागवतम् (1.1.1) के आरंभ में की गई है जहाँ किसी अवतार की विशेषताओं का भली प्रकार से वर्णन किया गया है. उस श्लोक में, परम औऱ सत्यम दो पदों का उपयोग किया गया है, और भगवान चैतन्य सूचित करते हैं कि इन शब्दों में कृष्ण की मुख्य विशेषताएँ उजागर होती हैं. अन्य गौण विशेषताएँ बताती हैं कि उन्होंने ब्रम्हा को वैदिक ज्ञान की शिक्षा दी थी और पारलौकिक प्रकटन की रचना के लिए पुरुष-अवतार लिया था. ये किसी विशेष उद्देश्य के लिए प्रकट होने वाली तात्कालिक विशेषताएँ हैं. व्यक्ति को किसी अवतार की मुख्य और गौण विशेषताओं को समझने और उनमें अंतर करने में सक्षम होना चाहिए. एक बुद्धिमान व्यक्ति मुख्य और गौण विशेषताओं का अध्ययन किए बिना किसी भी व्यक्ति को अवतार के रूप में स्वीकार नहीं करेगा.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान चैतन्य, स्वर्ण अवतार की शिक्षाएँ”, पृ. 102

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