कृष्ण चेतन बन जाने से अनर्थ-अपगमः, सभी अनर्थों का लोप हो जाता है, वे दयनीय स्थितियाँ जिन्हें हमने अनावश्यक ही स्वीकार कर लिया है. भौतिक शरीर इन अवांछित दयनीय स्थितियों का मूल सिद्धांत होता है. संपूर्ण वैदिक सभ्यता इन अवांछित दुखों से व्यक्ति को छुटकारा देने के लिए है, लेकिन प्रकृति के नियमों से बंधे व्यक्तियों को जीवन के लक्ष्य का पता नहीं होता है. इत-तन्त्र्यम उरु-दम्नि बद्ध: वे भौतिक प्रकृति की तीन शक्तिशाली अवस्थाओं से प्रभावित होते हैं. वह शिक्षा जो जन्म-जन्मांतर तक बद्ध आत्मा को बांधे रखती है, भौतिकवादी शिक्षा कहलाती है. श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने समझाया है कि भौतिकवादी शिक्षा माया के प्रभाव को बढ़ाती है. ऐसी शिक्षा बद्ध आत्मा को भौतिक जीवन की ओर उत्तरोत्तर आकर्षित होने के लिए प्रेरित करती है और अवांछित दुखों से मुक्ति के मार्ग से बहुत दूर भटकाती है. कोई पूछ सकता है कि उच्च शिक्षित व्यक्ति कृष्ण चेतना में क्यों नहीं आते. इसका कारण इस श्लोक में बताया गया है. जब तक व्यक्ति किसी प्रामाणिक, पूर्ण कृष्ण चेतन गुरु की शरण नहीं लेता, तब तक कृष्ण को समझने की कोई संभावना नहीं है. लाखों लोगों द्वारा सम्मानित शिक्षक, विद्वान, और राजनेता जीवन के लक्ष्य नहीं समझ सकते और कृष्ण चेतना को नहीं अपना सकते, क्योंकि उन्होंने प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु और वेदों को स्वीकार नहीं किया है. इसलिए मुंडक उपनिषद (3.2.3) में कहा गया है, नयम् अत्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुणा श्रुतेन : केवल अकादमिक शिक्षा प्राप्त करके, एक विद्वतापूर्ण विधि से (प्रवचनेन लभ्यः) व्याख्यान प्रस्तुत करके, या कई अद्भुत चीजों का पता लगाने वाले एक बुद्धिमान वैज्ञानिक होने मात्र से, व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार नहीं हो सकता है. जब तक व्यक्ति को भगवान के परम व्यक्तित्व की कृपा नहीं मिलती, तब तक वह कृष्ण को नहीं समझ सकता. केवल वही कृष्ण को समझ सकता है, जिसने कृष्ण के शुद्ध भक्त के समक्ष समर्पण किया हो और उसके चरण कमलों की धूलि धारण की हो.

 

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम”, सातवाँ सर्ग, अध्याय 5 – पाठ 32

(Visited 14 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •