उनके लिए जो भौतिक रूप से आसक्त होते हैं, इंद्रियों का नियंत्रण आवश्यक होता है, किंतु एक भक्त की इंद्रियाँ भगवान की सेवा में रत होती हैं, जिसका अर्थ है कि वे पहले ही से नियंत्रण में हैं. परम दृष्ट्वा निवर्तते (भगी. 2.59). एक भक्त की इंद्रियाँ भौतिक भोग से आकर्षित नहीं होती. और भले ही भौतिक संसार कष्टों से भरा होता है, भक्त इस भौतिक संसार को भी आध्यात्मिक मानता है क्योंकि सब कुछ भगवान की सेवा में ही रत है. आध्यात्मिक संसार और भौतिक संसार में सेवा की भावना का अंतर होता है. निर्बंधः कृष्ण-संबंधे युक्तम वैराग्यम उच्यते. जब भगवान के परम व्यक्तित्व की सेवा की भावना नहीं होती, तो व्यक्ति की गतिविधियाँ भौतिक होती हैं.

प्रपंचि-कतय बुद्द्य हरि-संबंधि-वस्तुनः
मुमुक्षभिः परित्यागो वैराग्यम फलगु कथ्यते
(भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.256)

वह जो भगवान की सेवा में रत नहीं है भौतिक होता है, और इस प्रकार से रत वस्तु को त्याग नहीं जाना चाहिए. किसी ऊँची गगनचुंबी इमारत के निर्माण और किसी मंदिर के निर्माण में, एक समान उत्सुकता हो सकती है, किंतु प्रयास में अंतर होता है, क्योंकि एक भौतिक होता है और दूसरा आध्यात्मिक. आध्यात्मिक गतिविधियों को भौतिक गतिविधियाँ नहीं मान लेना चाहिए, और छोड़ना नहीं चाहिए. हरि, भगवान के परम व्यक्तित्व से जुड़ा कुछ भी भौतिक नहीं होता. एक भक्त जो इस सबका विचार करता है, हमेशा आध्यात्मिक गतिविधियों में स्थित होता है, और इसलिए वह भौतिक गतिविधियों से और आकर्षित नहीं होता (परम दृष्ट्वा निवर्तते).

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , नवाँ सर्ग, अध्याय 4 – पाठ 25

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