जब भगवान कृष्ण ब्रम्हा के समय के प्रत्येक 24 घंटे में एक बार (या 8,640,000,000 सौर वर्षों के अंतराल के बाद) प्रत्येक ब्रम्हांड में प्रकट होते हैं, और उनकी सभी पारलौकिक लीलाएँ प्रत्येक ब्रम्हांड में एक नियमित चक्र में प्रदर्शित होती हैं. लेकिन उस नियमित चक्र में भगवान कृष्ण, भगवान वासुदेव, इत्यादि के कार्य सामान्य व्यक्ति के लिए एक जटिल समस्या होते हैं. भगवान के आत्म और भगवान के पारलौकिक शरीर में कोई अंतर नहीं होता. विस्तार अंतरकारी गतिविधियों को कार्यशील करता है. यद्यपि, जब प्रभु, भगवान श्रीकृष्ण के रूप में उनके व्यक्तित्व में प्रकट होते हैं, तो उनके अन्य विस्तृत अंश भी उनके योगमाया नामक अकल्पनीय सामर्थ्य से उनके साथ जुड़ते हैं, औऱ इस प्रकार वृंदावन के भगवान कृष्ण, मथुरा के भगवान कृष्ण या द्वारका के भगवान कृष्ण से भिन्न होते हैं. भगवान कृष्ण का विराट रूप भी उनके अकल्पनीय सामर्थ्य द्वारा उनसे भिन्न होता है. कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में प्रदर्शित उनका विराटरूप उनके रूप का भौतिक आकल्पन है. इसलिए यह समझना चाहिए कि जब भगवान कृष्ण शिकारी के धनुष-बाण द्वारा स्पष्ट रूप से मारे गए थे, तब भगवान अपने तथाकथित भौतिक शरीर को भौतिक संसार में छोड़ गए थे. भगवान कैवल्य हैं, और उनके लिए पदार्थ और आत्मा में कोई अंतर नहीं है क्योंकि प्रत्येक वस्तु की रचना उनके लिए ही की गई है. इसलिए उनका एक प्रकार के शरीर को छोड़ने या एक अन्य शरीर को स्वीकारने का यह अर्थ नहीं है कि वे एक सामान्य जीव के समान हैं. ऐसी सभी गतिविधियाँ उनकी अकल्पनीय शक्ति द्वारा एक साथ ही एक भी होती हैं और भिन्न भी. जब महाराज युधिष्ठिर उनके खो जाने की संभावना पर शोक कर रहे थे, तो वह केवल एक महान मित्र के खो जाने का विलाप करने की परंपरानुसार था, लेकिन वास्तविकता में भगवान अपने पारलौकिक शरीर को कभी नहीं त्यागते हैं, जैसा कि अल्पबुद्धि व्यक्तियों द्वारा गतत समझा जाता है. ऐसे कम बुद्धिमान व्यक्तियों की निंदा स्वयं भगवान द्वारा भगवद्-गीता में की गई है, और उन्हें मूढ़ कहा जाता है. भगवान ने अपना शरीर त्यागा इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने पूर्णांश को संबंधित धामों (पारलौकिक धामों) में त्याग दिया, जैसे उन्होंने अपने विराट रूप को भौतिक संसार में छोड़ दिया था.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, प्रथम सर्ग, अध्याय 14 – पाठ 8

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