श्रील श्रीधर स्वामी ने तपोमय का अनुवाद “ज्ञान से भरपूर” के रूप में किया है. तपस शब्द, सामान्यतः “तपस्या” का संकेत देता है, जो संस्कृत क्रिया तप से लिया गया है, जिसके अर्थ का सारांश सूर्य के विभिन्न कार्य-कलापों को इंगित करने वाले के रूप में लिया जा सकता है. तप का अर्थ है “जलना, प्रकाशित होना, तपना इत्यादि.” परम भगवान नित्य पूर्ण हैं, और इसलिए यहां तपो-मयं यह इंगित नहीं करता है कि उनका दिव्य शरीर तपस्या के लिए है, क्योंकि तपस्या बद्ध आत्माओं द्वारा स्वयं को शुद्ध करने या कोई विशेष शक्ति प्राप्त करने के लिए की जाती है. एक सर्वशक्तिमान, संपूर्ण अस्तित्व न तो स्वयं को शुद्ध करता है और न ही शक्ति प्राप्त करता है: वह सदा शुद्ध और सर्वशक्तिमान है. इसलिए श्रीधर स्वामी ने बुद्धिमत्तापूर्ण यह समझ लिया कि इस प्रसंग में तप शब्द का अर्थ सूर्य के प्रकाशित करने के कार्य से है और इस प्रकार यह इंगित करता है कि भगवान का आत्म-प्रकाशमान शरीर अंतर्यामी होता है. प्रकाश ज्ञान का एक सामान्य प्रतीक है. भगवान का आध्यात्मिक तेज केवल शारीरिक रूप से प्रकाशित नहीं होता है, जैसा कि मोमबत्ती या बल्ब के प्रसंग में होता है; इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भगवान का शरीर हमारी चेतना को पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित करता है क्योंकि भगवान का तेज ही पूर्ण ज्ञान होता है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 27- पाठ 04

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