मानव को व्यवधान पहुंचाने के लिए प्रकृति के नियमों द्वारा बनाए गए निम्न पशु दंड के अधीन नहीं होते हैं. क्योंकि मानव ने चेतना विकसित की है, हालांकि, वह निंदित हुए बिना वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता है. भगवद-गीता (4.13) में कृष्ण कहते हैं, चतुर्-वर्ण्यम माया सृष्टम गुण-कर्म-विभासः: “भौतिक प्रकृति की तीन विधियों और उनके कार्य के अनुसार, मानव समाज के चार विभाग मेरे द्वारा बनाए गए थे.” इसलिए सभी मनुष्यों को चार वर्गों–ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र– में बाँटा जाना चाहिए और उन्हें अपने लिए निर्धारित नियमों के अनुसार कार्य करना चाहिए. वे उनके निर्धारित नियमों से विचलित नहीं हो सकते. इनमें से एक नियम कहता है कि उन्हें किसी पशु को कष्ट नहीं देना चाहिए भले ही वे पशु मनुष्यों को कष्ट पहुँचाते हों. कोई बाघ यदि किसी अन्य पशु पर हमला करता है और उसका मांस खाता है तो वह पापी नहीं है, यदि विकसित चेतना वाला मनुष्य ऐसा करता है, तो उसे अवश्य दंडित किया जाना चाहिए. दूसरे शब्दों में, कोई मनुष्य जो अपनी विकसित चेतना का उपयोग करने के स्थान पर किसी पशु जैसा व्यवहार करता है, वह निश्चित ही कई विभिन्न नर्कों में दंड का अधिकारी होता है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, पाँचवा सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 17

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