ऐसा कहा जाता है कि एक बार स्वर्ग के राजा, इंद्र को उनके आध्यात्मिक गुरु, ब्रहस्पति ने उनके दुर्व्यवहार के कारण शाप दिया था, और वह इस ग्रह पर शूकर बन गए थे. बहुत दिनों के बाद, जब ब्रह्मा ने उन्हें अपने स्वर्गीय राज्य में वापस बुलाना चाहा, तो शूकर के रूप में इंद्र स्वर्गीय राज्य में अपनी राजकीय स्थिति के बारे में सबकुछ भूल गए, और उन्होंने वापस जाने से मना कर दिया. यही मायाजाल है. यहाँ तक कि इंद्र भी अपने स्वर्गीय जीवन को भूल जाते हैं और शूकर के जीवन स्तर से संतुष्ट हो जाते हैं. माया के प्रभाव से बद्ध आत्मा अपने विशेष प्रकार के शरीर के प्रति इतनी स्नेह-पूर्ण हो जाती है कि यदि उसे प्रस्ताव दिया जाए, “इस शरीर को त्याग दो, और तुम्हारे पास तत्काल एक राजा का शरीर होगा,” तो वह सहमत नहीं होगा. यह लगाव सभी बद्ध जीवों को दृढ़ता से प्रभावित करता है. भगवान कृष्ण व्यक्तिगत रूप से प्रचार कर रहे हैं, “इस भौतिक संसार में सब कुछ त्याग दो. मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें समस्त सुरक्षा दूंगा,” लेकिन हम सहमत नहीं होते हैं. हम सोचते हैं, “हम बिलकुल ठीक हैं. हमें कृष्ण के प्रति मर्पण क्यों करना चाहिए और उनकेराज्य में वापस क्यों जाना चाहिए? इसे भ्रम, या माया कहा जाता है. हर कोई अपने जीवन स्तर से संतुष्ट है, चाहे वह कितना भी घृणास्पद हो.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 30 – पाठ 05

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