जीवों के दो वर्ग होते हैं–दैत्य और देवता–और भगवान का परम व्यक्तित्व दोनों के ऊपर होता है. दैत्य उत्पत्ति की “संयोग” वाली धारणा में विश्वास करते हैं, जबकि देवता भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा जगत उत्पत्ति में विश्वास करते हैं. परम भगवान के सर्वशक्तिमान होने को यहाँ सिद्ध किया गया है, क्योंकि केवल एक हाथ से उन्होंने मंदार पर्वत, देवता और दैत्यों को उठा लिया था, और उन्हें गरुड़ की पीठ पर रख दिया था और उन्हें क्षीर सागर ले आए थे. अब, देवताओं, भक्त तो इस घटना को स्वीकार कर लेंगे, यह जानते हुए कि भगवान कुछ भी उठा सकते हैं भले ही वह कितना भी भारी हो. किंतु भले ही दैत्यों को भी देवताओं के साथ ही लाया गया था, इस घटना के बारे में सुनकर वे यही कहेंगे कि यह मिथकीय है. लेकिन यदि भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो किसी पर्वत को उठा लेना उनके लिए क्यों कठिन होगा? चूँकि वे सैकड़ों और सहस्त्रों मंदार पर्वतों के साथ असंख्य ग्रहों को चला रहे हैं, तो वे उनमें से एक को अपने हाथ से क्यों नहीं उठा सकते? यह मिथक नहीं है, बल्कि आस्थावानों और आस्थाहीन लोगों के बीच अंतर यह है कि भक्तजन वैदिक साहित्य में वर्णित घटनाओं को सत्य मानते हैं, जबकि दैत्य बस कुतर्क करते हैं और इन ऐतिहासिक घटनाओं को मिथक बताते हैं. दैत्य यही समझाना चाहेंगे कि जगत उत्पत्ति में होने वाला सब कुछ संयोगवश होता है, किंतु देवता, या भक्त, किसी भी घटना को संयोग नहीं मानते. बल्कि, वे जानते हैं कि सब कुछ भगवान के परम व्यक्तित्व की व्यवस्था है. यही देवताओं और दैत्यों के बीच का अंतर है.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 6 – पाठ 38

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