यहाँ अक्रूर दो कारण बताते हैं कि क्यों भगवान किसी भौतिक रूप से आच्छादित होते लगते हैं, या किसी मानव के समान जन्म लेते प्रतीत होते हैं. पहला, जब भगवान कृष्ण अपनी लीलाएँ करते हैं, तो उनके स्नेहिल भक्त उन्हें अपनी संतान, मित्र, प्रेमी इत्यादि मानते हैं. इस प्रेमपूर्ण पारस्परिकता के आनंद में, वे कृष्ण को भगवान नहीं मानते. उदाहरण के लिए, कृष्ण लिए अपने असाधारण प्रेम के कारण, माता यशोदा को चिंता है कि वे वन में घायल हो जाएंगे. वे ऐसा अनुभव करती हैं, यह भगवान की इच्छा है, जिसे यहाँ निकामः शब्द से दर्शाया गया है. भगवान के भौतिक प्रतीत होने के दूसरे कारण का संकेत अविवेक शब्द से मिलता है: केवल अज्ञानता, विभेदन-क्षमता की कमी के कारण, कोई व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व की स्थिति को समझने में त्रुटि कर सकता है. भागवतम के ग्यारहवें सर्ग में, श्री उद्धव के साथ भगवान कृष्ण की चर्चा में, भगवान विस्तृत रूप से बंधन और मुक्ति से परे उनकी दिव्य स्थिति की चर्चा करते हैं. जैसा कि वैदिक साहित्य में कहा गया है, देह-देहि-विभागो यां नेश्वरे विद्यते क्वचित : “परम भगवान में कभी भी शरीर और आत्मा का भेद नहीं होता है.” दूसरे शब्दों में, श्री कृष्ण का शरीर शाश्वत, आध्यात्मिक, सर्वज्ञ और सभी सुखों का भंडार है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 48- पाठ 22

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