चूँकि पुत्र अपने पिता को पुत नामक नर्क में दंड से बचाता है, उसको पुत्र कहा जाता है. इस सिद्धांत के अनुसार, जब पिता और माता के बीच असहमति होती है, तो वह पिता होता है, जिसका उद्धार पुत्र द्वारा किया जाता है, न कि माता का. किंतु यदि पत्नी अपने पति के प्रति निष्ठावान और दृढ़ होती है, तो जब पिता का उद्धार होता है, तब माँ का भी उद्धार हो जाता है. परिणामस्वरूप, वैदिक साहित्य में तलाक जैसी कोई वस्तु नहीं होती है. एक पत्नी को हमेशा अपने पति के प्रति पवित्र और निष्ठावान रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, क्योंकि इससे उसे किसी भी घृणित भौतिक स्थिति से मुक्ति प्राप्त करने में सहायता मिलती है. यह श्लोक स्पष्ट रूप से कहता है, पुत्रो नयति नारदेव यम-क्षयत: “पुत्र अपने पिता को यमराज के कारावास से बचाता है.” वह कभी यह नहीं कहता, पुत्र नयति मातरम: “बेटा अपनी माँ को बचाता है.” बीज देने वाले पिता का उद्धार होता है, भण्डारण करने वाली माता का नहीं. परिणामस्वरूप, पति और पत्नी को किसी भी हालत में अलग नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि उनकी एक संतान है जिसका पालन वे वैष्णव बनIने के लिए करते हैं, तो वह माता और पिता दोनों को यमराज के कारावास और नारकीय जीवन के दण्ड से बचा सकता है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, नौवाँ सर्ग, अध्याय 20- पाठ 22

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