भौतिक जीवन ऐसा होता है कि अवैध यौन संबंध, जुआ, नशा और माँस भक्षण में रत होने के कारण बद्ध आत्मा हमेशा खतरनाक स्थिति में रहती है. माँस भक्षण और नशा इंद्रियों को अधिकाधिक उत्तेजित कर देते हैं, और बद्ध आत्मा स्त्रियों के पाश में आ जाता है. स्त्रियों की संगति के लिए धन की आवश्यकता होती है, और धन अर्जित करने के लिए, व्यक्ति भिक्षा माँगता है, उधार लेता है या चोरी करता है. निस्संदेह, वह ऐसे घृणित कार्य करता है जिनके परिणाम से उसे इस जीवन और आगामी जीवन में कष्ट भोगने पड़ते हैं. अतः अवैध यौन क्रिया को उन लोगों द्वारा रोका जाना चाहिए जो आध्यात्मिक रूझान रखते हैं या जो आध्यात्मिक बोध के मार्ग पर हैं. कई भक्त अवैध यौन संबंध के कारण पतित हो जाते हैं. वे धन चुरा सकते हैं और यहाँ तक कि अत्यंत सम्मानित त्याग के पथ से भी पतित हो सकते हैं. फिर जीवन यापन के लिए वे बहुत तुच्छ सेवाएँ भी स्वीकार कर लेते हैं और भिखारी बन जाते हैं. इसलिए शास्त्रों में ऐसा कहा गया है, यन् मैथुनादि-ग्रहमेधि-सुखम् हि तुच्छम : भौतिकवाद मैथुन पर आधारित है, भले वैध या अवैध. मैथुन खतरों से भरा हुआ होता है, उन लोगों के लिए भी जो गृहस्थ जीवन के आदी हैं. भले ही व्यक्ति के पास मैथुन का लायसेंस हो या नहीं, उसमें बहुत गड़बड़ी है. बहु-दुख-भाक: जब कोई मैथुन में रत होता है, तो उसके बाद कई कष्ट आते हैं. भौतिक जीवन में व्यक्ति अधिकाधिक कष्ट उठाता है. एक कंजूस व्यक्ति अपनी संपत्ति का उचित उपयोग नहीं कर सकता, और उसी प्रकार एक भौतिकवादी व्यक्ति मानव रूप का दुरुपयोग करता है. इसका उपयोग आध्यात्मिक उद्धार करने के स्थान पर, वह शरीर का उपयोग इंद्रिय भोग के लिए करता है. इसलिए वह कृपण कहलाता है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, पाँचवाँ सर्ग, अध्याय 14 – पाठ 22

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