“हिंदू” शब्द संस्कृत भाषा का नहीं है. यह शब्द मुस्लिमों द्वारा दिया गया था. एक नदी है जो संस्कृत में सिंधु कहलाती है. मुस्लिम स को ह उच्चारित करते हैं. सिंधु के स्थान पर उन्होंने उसे हिंदू बना दिया. इसलिए हिंदू एक ऐसा शब्द है जो संस्कृत शब्द कोष में नहीं पाया जाता है, लेकिन यह उपयोग में आ गया है. लेकिन वास्तविक सांस्कृतिक संस्था को वर्णाश्रम कहा जाता है. चार वर्ण (सामाजिक विभाजन) होते हैं – ब्राह्मण, क्ष्रत्रिय, वैश्य और शूद्र – और चार आश्रम (आध्यात्मिक विभाजन) होते हैं – ब्रम्हचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास. जीवन की वैदिक अवधारणा के अनुसार, जब तक लोग चार वर्ण और चार आश्रमों की यह प्रणाली नहीं अपनाते, वे सभ्य मानव नहीं बन सकते. व्यक्ति को सामाजिक व्यवस्था के इन चार विभाजनों की प्रक्रिया और आध्यात्मिक व्यवस्था के चार विभाजन; वर्णाश्रम को अपनाना ही होगा. भारतीय संस्कृति इस प्राचीन वैदिक प्रणाली पर आधारित है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी),”आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान”, पृ. 201, 227

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