जो कुछ भी है उसका स्रोत होने के नाते, भगवान सभी तपस्याओं और आत्म संयम के मूल हैं. आत्म-साक्षात्कार में सफलता प्राप्त करने के लिए ऋषियों द्वारा कठिन तपस्या की जाती है. मानव जीवन ब्रह्मचर्य के महान व्रत के साथ, ऐसी तपस्या के लिए ही है. तपस्या के कठोर जीवन में, स्त्रियों से जुड़ाव के लिए कोई स्थान नहीं है. और चूँकि मानव जीवन तपस्या के लिए है, आत्म-साक्षात्कार के लिए, सनातन-धर्म की प्रणाली या चार जातियों और जीवन के चार आश्रम के विचार की परिकल्पना के अनुसार, वास्तविक मानव सभ्यता, जीवन के तीन चरणों में स्त्री से कठोर अलगाव को निर्धारित करती है. क्रमिक सांस्कृतिक विकास के क्रम में, व्यक्ति के जीवन को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ जीवन, वानप्रस्थ और सन्यास. जीवन के पहले चरण के दौरान, पच्चीस वर्ष की आयु तक, एक पुरुष को किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में ब्रह्मचारी के रूप में प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वह समझ सके कि स्त्री भौतिक अस्तित्व में वास्तविक बाध्यकारी शक्ति है. यदि कोई सीमित जीवन के भौतिक बंधन से मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, तो उसे स्त्री के रूप के आकर्षण से मुक्त होना चाहिए. स्त्री या रूपवान लिंग, जीवों, विशेषकर मानवों के लिए आकर्षक सिद्धांत है, और पुरुष रूप आत्म-साक्षात्कार के लिए है. समस्त संसार स्त्री के आकर्षण के जाल में घूम रहा है, और जैसे ही कोई पुरुष महिला से संगम करता है, वह तुरंत भौतिक दासता की कसी हुई गाँठ का शिकार हो जाता है. आधिपत्य की झूठी भावना के नशे में, भौतिक संसार से उच्चतर रखने की इच्छा, विशेष रूप से पुरुष के स्त्री के समागम के ठीक बाद शुरू होती है. घर बनाने, धरती के स्वामित्व, संतान प्राप्ति और समाज में प्रमुख बनने की लालसाएँ, समुदाय और जन्म स्थान के लिए स्नेह, और संपत्ति की लालसा, जो छायाचित्र या दिवा स्वप्न होते हैं, मानव को उलझा देते हैं, और इसलिए वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य, आत्म-साक्षात्कार की प्रगति में बाधित होता है. ब्रम्हचारी, या पाँच वर्ष की आयु को किसी बालक को, विशेषकर ऊँची जाति से, जैसे विद्वान माता-पिता से (ब्राम्हण), प्रशासी माता-पिता (क्षत्रिय), या व्यापारी या उत्पादनकर्ता माता-पिता (वैश्य), को पच्चीस वर्ष की आयु तक किसी प्रामाणिक गुरू या शिक्षक की देखरेख में, और कड़े अनुशासन में प्रशिक्षित किया जाता है. जिससे वह आजीविका के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण लेने के साथ जीवन के मूल्यों को समझ पाता है. उसके बाद ब्रम्हचारी को घर जाने और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने और उपयुक्त स्त्री से विवाह की अनुमति दी जाती है. किंतु ऐसे कई ब्रमह्चारी होते हैं जो गृहस्थ बनने के लिए घर नहीं जाते बल्कि स्त्रियों के साथ कोई भी संपर्क रखे बिना, नैष्ठिक- ब्रम्हचारियों का जीवन जारी रखते हैं. वे अच्छी तरह ये जानते हुए सन्यास आश्रम, या जीवन के त्यागमय जीवन व्यवस्था को स्वीकार करते हैं, कि स्त्रियों से संसर्ग एक अनावश्यक बोझ है जो आत्म-साक्षात्कार में बाधा पहुँचाता है. चूंकि जीवन की एक विशिष्ट अवस्था में यौन इच्छा बहुत प्रबल होती है, इसलिए गुरु ब्रह्मचारी को विवाह करने की अनुमति दे सकता है; यह लाइसेंस एसे ब्रह्मचारी को दिया जाता है, जो नैष्ठिक-ब्रह्मचर्य के मार्ग को जारी रखने में असमर्थ होता है, और इस तरह के भेद, प्रामाणिक गुरु के लिए संभव होते हैं. एक तथाकथित परिवार नियोजन कार्यक्रम की आवश्यकता होती है. वह गृहस्थ, जो ब्रह्मचर्य के गहन प्रशिक्षण के बाद, स्त्रियों से पौराणिक प्रतिबंधों के तहत ही संबंध रखता है, वह बिल्लियों और कुत्तों के समान घरेलू नहीं हो सकता. ऐसे गृहस्थ को, वानप्रस्थ के रूप में स्त्री संबंध से निवृत्त होना होता है, उसे स्त्री संबंध रखे बिना अकेले रहने की शिक्षा दी जाती है. प्रशिक्षण पूर्ण हो जाने पर, वही निवृत्त गृहस्थ एक सन्यासी बन जाता है, जो स्त्री से, बल्कि अपनी ब्याहता पत्नी से भी बिलकुल अलग रहता है. स्त्रियों से असंबद्धता की संपूर्ण योजना का अध्ययन करते हुए, ऐसा लगता है कि स्त्री आत्म-साक्षात्कार के लिए रुकावट है, और भगवान स्त्री से असंगति के जीवन व्रत के सिद्धांत की शिक्षा के लिए नारायण के रूप में प्रकट हुए हैं. दृढ़ ब्रम्हचारियों के सादे जीवन से ईर्ष्या रखते हुए, देवता कामदेव के दूत भेज कर उनके व्रत को भंग करने का प्रयास करते रहते हैं. लेकिन भगवान के संदर्भ में, यह प्रयास असफल हुआ क्योंकि जब आकाशीय सुंदरियों ने यह देखा कि भगवान अपने रहस्यमयी आंतरिक पौरुष से ऐसी असंख्य सुंदरियों को पैदा कर सकते हैं और इसलिए बाहरी रूप से किसी के भी द्वारा आकर्षित किए जाने की आवश्यकता नहीं थी. एक आम कहावत है कि एक हलवाई कभी भी मीठे से आकर्षित नहीं होता है. हलवाई, जो हमेशा मिठाइयाँ बनाता है, उन्हें खाने की बहुत कम इच्छा रखता है; इसी तरह, भगवान, उनकी आनंद सामर्थ्य शक्तियों द्वारा, असंख्य आध्यात्मिक सुंदरियों को पैदा कर सकते हैं और भौतिक रचना के झूठे सौंदर्य से तनिक भी आकर्षित नहीं होते हैं. जो नहीं जानता वह मूर्खतापूर्ण रूप से यह आरोप लगाता है कि भगवान कृष्ण ने वृंदावन में अपनी रास-लीलाओं में स्त्रियों का भोग किया है, या अपनी सोलह हज़ार विवाहित रानियों के साथ भोग किया है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", द्वितीय सर्ग, अध्याय 7 - पाठ 6
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