सांख्य का अर्थ आत्मा और तत्व का ज्ञान है. सांख्य दार्शनिक भौतिक संसार को चौबीस भागों से बना हुआ बताते हैं: पाँच स्थूल तत्व, तीन सूक्ष्म तत्व, पाँच ज्ञान-प्राप्ति की इंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच इंद्रिय विषय और भौतिक प्रकृति के अप्रकट प्रकार, प्रधान.

पाँच स्थूल तत्व हैं: पृथ्वी, तजल, अग्नि, वायु, और आकाश. उसके बाद सूक्ष्म तत्व आते हैं. आकाश से सूक्ष्म मष्तिष्क है, मष्तिष्क से सूक्ष्म बुद्धि है, और बुद्धि से सूक्ष्म मिथ्या अहम् है, झूठी अवधारणा कि मैं ही तत्व हूँ. पाँच ज्ञान-प्राप्ति की इंद्रियाँ आँखें, नाक, कान, जिव्हा, और त्वचा हैं. पाँच कर्मेंद्रियाँ स्वर, पाँव, हाथ, गुदा, और गुप्तांग हैं. और पाँच इंद्रिय विषय गंध, स्वाद, रूप, स्पर्श, और ध्वनि हैं.

चौबीस भागों में भौतिक संसार का यह विश्लेषण सांख्य कहलाता है. यह हमारे अनुभव के भीतर के सबकुछ का पूरा विश्लेषण है. और इन चौबीस तत्वों के ऊपर आत्मा है. और आत्मा के ऊपर भगवान हैं.

सांख्यवादी आत्मा को नहीं खोज सकते. इस बात में वे भौतिक विज्ञानियों के समान हैं वे बस भौतिक वस्तुओं का अध्ययन करते हैं. उसके आगे उन्हें कोई जानकारी नहीं होती. मैं अभी आपसे बात कर रहा हूँ; तो सांख्य दार्शनिक इसकी व्याख्या नहीं कर सकता कि बात कोन कर रहा है. साथ ही, शरीर की चीर-फाड़ करने के बाद भी चिकित्सक उस आध्यात्मिक बल को नहीं खोज पाता जो कार्य कर रहा है. और क्योंकि भौतिकवादी परम भगवान के कण मात्र – हम प्राणियों – को भी खोज नहीं पाते तो उनकी भगवान को खोजने की क्या संभावना हो सकती है? इसलिए न तो योगी और न ही सांख्य वादी भगवान को ढूँढ सकते हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “आत्मज्ञान की खोज”, पृष्ठ 96
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