जब यमराज और उनके सहयोगी किसी जीव को न्याय के स्थान तक ले जाते हैं, तो जीव के अनुसरणकर्ता होने के नाते जीवन, जीवन वायु और कामनाएँ भी उसके साथ जाती हैं. इसकी पुष्टि वेदों में की गई है. जब जीव को यमराज द्वारा ले जाया या बंदी बनाया जाता है (तम उत्क्रमंतम), तो प्राणवायु भी उसके साथ जाती है (प्राणो नुत्क्रमंति), और जब प्राण वायु जा चुकी हो (प्राणम् अनुत्क्रमंतम्), सभी इंद्रियाँ (सर्वे प्राणः) भी साथ जाती हैं (अनुत्क्रमंति). जब जीव और प्राणवायु जा चुके हों, तब पाँच तत्वों–पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से बना हु्आ पिण्ड– का तिरस्कार करते हुए उसे पीछे छोड़ दिया जाता है. फिर जीव न्याय की सभा में जाता है और यमराज तय करते हैं कि उसे अगली बार किस प्रकार का शरीर मिलेगा. यह प्रक्रिया आधुनिक वैज्ञानिक नहीं जानते. प्रत्येक जीव इस जीवन में अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है, और मृत्यु के बाद उसे यमराज के दरबार में ले जाया जाता है, जहाँ निर्धारित किया जाता है कि उसे अगली बार किस प्रकार का शरीर मिलेगा. हालाँकि स्थूल भौतिक शरीर को छोड़ दिया जाता है, जीव और उसकी कामनाएँ, साथ ही उसके पिछले कर्मों की प्रतिक्रियाएँ भी आगे जाती हैं. यमराज ही हैं जो निर्धारित करते हैं कि पिछले कर्मों के अनुसार उसे अगली बार किस प्रकार का शरीर मिलेगा.

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, चौथा सर्ग, खंड 28 – पाठ 23

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