धर्म शब्द का अर्थ “कर्तव्य” होता है. हालाँकि धर्म शब्द का अनुवाद अक्सर “पंथ” के रूप में किया जाता है और पंथ को एक प्रकार की आस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है, धर्म आस्था का एक प्रकार नहीं है. धर्म का अर्थ है व्यक्ति का वास्तविक स्वाभाविक कर्तव्य. धर्मम् तु साक्षात् भागवत्-प्राण्यम्: वास्तव में कोई भी नहीं जानता कि धर्म क्या है, और कोई भी धर्म का निर्माण नहीं कर सकता. धर्म परमात्मा की व्यवस्था है. कोई भी राज्य नियमों का निर्माण नहीं कर सकता ; वे शासन द्वारा निर्धारित किए जाते हैं. धर्म की सबसे सरल परिभाषा यह है कि धर्म परमात्मा की व्यवस्था है. चूँकि परमात्मा, भगवान, एक है, उसकी व्यवस्था भी एक ही होना चाहिए. फिर, विभिन्न धर्म कैसे हो सकते हैं? यह संभव नहीं है. विभिन्न धर्मों की रचना अज्ञानतावश हुई है, जिसके कारण लोग हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, यह धर्म या वह धर्म के अर्थों में सोचते हैं. नहीं भगवान तो सोना हैं. यदि एक ईसाई के पास सोना है, तो क्या वह ईसाई सोना हो जाता है? सोना, सोना ही होता है चाहे वह किसी हिंदू, मुस्लिम, या किसी ईसाई के स्वामित्व में हो. परम भगवान के व्यक्तित्व की व्यवस्था के अनुसार, धर्म का अर्थ उस परमात्मा के प्रति समर्पण कर देना है. यह जानना व्यक्ति का कर्तव्य है कि आत्मा की क्या आवश्यकताएँ हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश हमें आत्मा की कोई जानकारी नहीं है और हम शारीरिक सुख के लिए आवश्यकताओं की पूर्ति में लगे हुए हैं. हालाँकि शारीरिक सुख पर्याप्त नहीं है. मान लीजिये कि कोई व्यक्ति बड़े सुख से रह रहा है. क्या इसका अर्थ है कि वह नहीं मरेगा? निस्संदेह, उसकी मृ्त्यु होगी. हम अस्तित्व के संघर्ष और योग्यतम के बचे रहने की बात करते हैं, लेकिन केवल शारीरिक सुविधा किसी व्यक्ति को स्थायी अस्तित्व के या जीवित रहने के योग्य नहीं बना सकती. इसलिए, केवल शरीर का ध्यान रखना धर्मस्य ग्लानिः, या व्यक्ति के कर्तव्य का संदूषण कहलाता है. व्यक्ति को शरीर की आवश्यकताएँ पता होनी चाहिए और आत्मा की आवश्यकताएँ भी. जीवन की वास्तविक आवश्यकता आत्मा को सुख पहुँचाना है, और आत्मा को भौतिक समाधानों से सुख नहीं पहुँचाया जा सकता. चूँकि आत्मा की अलग पहचान होती है, आत्मा को आध्यात्मिक भोजन दिया जाना आवश्यक है, और वह आध्यात्मिक भोजन कृष्ण चेतना है. जब कोई अस्वस्थ होता है तो उसे सही भोजन और उचित दवाइयाँ दिए जाने चाहिए. दोनों आवश्यक हैं. यदि उसे केवल दवाइयाँ दी जाएँ और अच्छा भोजन न दिया जाए, तो उपचार उतना सफल नहीं होगा. इसलिए कृष्ण चेतना आंदोलन का उद्देश्य आत्मा के लिए सही दवाई और अच्छा भोजन दोनों प्रदान करना है. भोजन कृष्ण-प्रसाद है, वह भोजन जो पहले कृष्ण को प्रस्तुत किया जाता है, और हरे कृष्णा मंत्र दवाई है.

धर्म में भगवान के नियम होते हैं. वे लोग जो यह नहीं जानते, सोचते हैं कि धर्म का अर्थ आस्था होता है. लेकिन भले ही आपकी किसी वस्तु में आपकी आस्था हो और मेरी किसी अन्य वस्तु में, और भले ही मुझे आप पर विश्वास हो और आपको मुझ पर विश्वास हो या न हो, यह धर्म नहीं है. यहाँ तक कि कहा जाता है कि ऐसा धार्मिक अभियान भी है जो कहता है, “आप अपना मार्ग स्वयं बना सकते हैं”. यथा मत तथा पथ: “आप जिसे भी सही समझते हों, वह सही है”. यह उनका दर्शन है. लेकिन यह विज्ञान नहीं है. मान लीजिये मैं एक विक्षिप्त व्यक्ति हूँ. क्या मैं जो भी सोचता हूँ वह सही है? यह कैसे हो सकता है? “दो और दो का योग चार होता है” यह विज्ञान है. यदि मैं मानता हूँ कि दो और दो का योग पाँच या तीन होता है, तो क्या यह सच हो जाएगा? नहीं. अतः भगवान के नियम होते हैं, और जब धर्मस्य ग्लानिः, इन नियमों का उल्लंघन होता है, तो हमें कष्ट होता है. वैसे ही जैसे राज्य के नियमों का उल्लंघन करने पर हमें दण्ड मिल सकता है, वैसे ही भगवान के नियम तोड़ने पर हम बहुत सारी समस्याओं के भागी बन जाते हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “रानी कुंती की शिक्षाएँ”, पृष्ठ 121, 150 

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2007 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान कपिल, देवाहुति पुत्र की शिक्षाएँ”, पृष्ठ 6

(Visited 2 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •