भगवान के इन पवित्र नामों का जाप आप कहीं भी और किसी भी समय पर कर सकते हैं, लेकिन नियमित जाप करने के लिए दिन का कोई निश्चित समय निर्धारित करना सबसे अच्छा है. प्रातःकाल के घण्टे आदर्श हैं. जब आप जाप करें, तो कृष्ण को प्रार्थनामय मनोदशा के साथ नामों का उच्चारण स्पष्ट रूप से करें. जब आपका मन भटके, तो उसे भगवान के नामों की ध्वनि पर वापस ले आएँ. जीवन की भौतिक अवधारणा में हम इंद्रिय संतुष्टि के विषय में व्यस्त हैं जैसे कि हम निचले, पशु स्तर पर हों. इंद्रिय संतुष्टि के इस स्तर से थोड़ा ऊपर, वह है जो भौतिक जंजाल से निकलने के लिए मानसिक विचारों में लगा हुआ है. इस वैचारिक स्तर से थोड़ा ऊपर वह होता है, जो व्यक्ति पर्याप्त बुद्धिमान हो, व्यक्ति सभी कारणों के सर्वोच्च कारण का पता लगाने का प्रयास करता है. और जब व्यक्ति, इंद्रिय, मन, और बुद्धि के स्तरों को पार करके, वास्तव में आध्यात्मिक ज्ञान के स्तर पर पहुँच जाता है, तब वह पारलौकिक स्तर पर होता है. हरे कृष्ण मंत्र के इस जाप का निर्वहन आध्यात्मिक स्तर से किया जाता है, और इस प्रकार यह ध्वनि स्पंदन चेतना की सभी निचली सतहों, इंद्रियमूलक, मानसिक, और बौद्धिक को पार कर जाता है. इसलिए, मंत्र की भाषा को समझने की आवश्यकता नहीं होती, इस महामंत्र को जपने के लिए मानसिक अनुमानों की कोई आवश्यकता नहीं होती, न ही बौद्धिक समायोजन की. यह स्वचालित, आध्यात्मिक स्तर से आता है, और इस तरह, कोई भी व्यक्ति बिना किसी पूर्व योग्यता के जाप में भाग ले सकता है. जब आप एकांत में जाप करते हैं, तो जाप की माला के साथ जाप करना श्रेष्ठ है. इससे आपको अपना ध्यान पवित्र नाम पर स्थिर रखने में सहायता मिलती है. जाप माला की प्रत्येक लड़ी में 108 छोटे मनके और एक बड़ा मनका, मुख्य मोती, होता है. मुख्य मोती से अगले मनके से प्रारंभ करें और संपूर्ण हरे कृष्ण मंत्र का जाप करते हुए अपने दाहिने हाथ के अंगूठे और मध्यमा के बीच इसे धीरे से घुमाएँ. फिर अगले मनके पर जाएँ और प्रक्रिया को दोहराएँ. यह जाप का एक चक्र होता है. फिर, मुख्य मोती पर जाप न करते हुए, मनकों को वापस पलटा लें और जिस पिछले मनके पर आप थे उससे जाप का दूसरा चक्र प्रारंभ करें.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण – अंग्रेजी), “परम भगवान का संदेश”, अंतिम पृष्ठ अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान”, पृष्ठ 168

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