एक आध्यात्मिक गुरु को ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि ईश्वर चेतना, कृष्ण चेतना का प्रसार करके ईश्वर का सबसे विश्वसनीय सेवक बनना चाहिए. विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं, साक्षात्-धारित्वेन समस्त-शास्त्रेर उक्तः : सभी शास्त्रों, वैदिक साहित्य में कहा गया है कि आध्यात्मिक गुरु को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए. इस प्रकार यह विचार कि आध्यात्मिक गुरु भगवान जैसा ही होता है मिथ्या नहीं है, और इसलिए जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करते हैं वे इस आध्यात्मिक निषेध को स्वीकार करते हैं (उक्तस तथा भव्यता एव सद्भिः). तो क्या आध्यात्मिक गुरु भगवान के सदृश होता है? किंतु प्रभोर यः प्रिय एव तस्य: आध्यात्मिक गुरु भगवान नहीं होता है, बल्कि भगवान का विश्वसनीय प्रतिनिधि होता है. भेद सेव्य-भगवान (वह जिसकी पूजा की जाती है) और सेवक-भगवान (वह जो उपासक है) के बीच है. आध्यात्मिक गुरु भगवान हैं, और कृष्ण भगवान हैं, लेकिन कृष्ण पूजनीय भगवान हैं जबकि आध्यात्मिक गुरु उपासक भगवान हैं. मायावादियों को यह समझ नहीं आता है. वे सोचते हैं, “चूँकि आध्यात्मिक गुरु को भगवान के रूप में स्वीकार करना पड़ता है और क्योंकि मैं आध्यात्मिक गुरु बन गया हूं, मैं भगवान बन गया हूं, जो कि एक विद्रोह हैं. भगवान इन को स्वीकार करते हैं पर वे अतिक्रमण करना चाहते हैं, जो वे वास्तव में कर नहीं सकते हैं, यह वे लोग हैं जो विद्रोही मूर्ख और दुष्ट होते हैं जिन्हें दंड की आवश्यकता होती है. इसलिए कुन्तीदेवी कहती हैं, अवनि-दृग-राजन्य-वंश-दहन: आप इन सभी दुष्टों को नष्ट करने आते हैं जो विद्रोही रूप से आपके पद पर दावा जताते हैं. जब विभिन्न राजा या भूमिधारक एक सम्राट के अधीनस्थ होते हैं, तो वे कभी-कभी विद्रोह करते हैं और करों का भुगतान करने से इनकार करते हैं. इसी तरह, ऐसे विद्रोही व्यक्ति भी होते हैं जो भगवान की सर्वोच्चता से इनकार करते हैं और खुद को भगवान घोषित करते हैं, और कृष्ण का कार्य उन्हें नष्ट करना है.

स्रोत:अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “महारानी कुंती की शिक्षाएँ”, पृ. 215
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