इस भौतिक संसार में, यौन संबंधों को उच्चतम संबद्धता माना जाता है, सबसे महान आनंद, हालाँकि वह केवल विकृत रूप में मौजूद होता है. पूरे संसार में कहीं भी इस तरह के धर्मशास्त्र का एक भी उदाहरण नहीं है. चैतन्य महाप्रभु ने परम भगवान के साथ हमारे संबंध की सबसे सही जानकारी दी. जीवन की अन्य धार्मिक अवधारणाओं में, भगवान को सबसे अधिक से अधिक पिता या माता के रूप में माना जाता है, हालाँकि, चैतन्य महाप्रभु हमें सूचित करते हैं कि भगवान के साथ यौन संबंध भी हो सकते हैं. यह जानकारी चैतन्य महाप्रभु का अद्वितीय योगदान है. यह जानकारी पहली बार चैतन्य महाप्रभु ने दी है: कोई व्यक्ति परम भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को अपने पति के रूप में, अपने प्रेमी के रूप में पा सकता है. यह राधा और कृष्ण की पूजा में संभव है, लेकिन कोई भी, विशेष रूप से अवैयक्तिकवादी, राधा-कृष्ण को नहीं समझ सकते. अवैयक्तिकवादियों को पता नहीं है; वे यह भी कल्पना नहीं कर सकते कि ईश्वर का कोई रूप है. लेकिन चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि न केवल भगवान का रूप है, बल्कि उनका यौन जीवन भी है. यह चैतन्य महाप्रभु का सर्वोच्च योगदान है, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार पूरा भौतिक जगत यौन जीवन के मूल सिद्धांत के कारण बदल जाता है. आधुनिक मानव सभ्यता में, काम सभी गतिविधियों का केंद्र बिंदु है; वास्तव में, हम जिस भी ओर देखें हमें यौन जीवन की प्रमुखता दिखाई देती है. परिणामस्वरूप, यौन जीवन अवास्तविक नहीं है; इसकी सच्ची वास्तविकता आध्यात्मिक संसार में अनुभव की जाती है. भौतिक कामक्रीड़ा मूल का विकृत प्रतिबंब है; मूल रूप परम सत्य में पाया जाता है. यह इस तथ्य को मान्य करता है कि परम सत्य व्यक्तिगत है, क्योंकि परम सत्य अवैयक्तिक नहीं हो सकता है और विशुद्ध यौन जीवन की भावना रखता है. अवैयक्तिक अद्वैतवादी दर्शन घृणित सांसारिक सेक्स के लिए एक अप्रत्यक्ष प्रेरणा देता है क्योंकि यह अंतिम सत्य की अवैयक्तिकता पर अत्यधिक बल देता है. इसका परिणाम यह है कि जिन पुरुषों में ज्ञान की कमी है, उन्होंने विकृत भौतिक यौन जीवन को समग्र रूप में स्वीकार कर लिया है क्योंकि उन्हें काम के वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप की कोई जानकारी नहीं है. भौतिक जीवन की रोगग्रस्त स्थिति में काम और आध्यात्मिक अस्तित्व में काम के बीच एक अंतर है.

आध्यात्मि कामक्रीड़ा दो प्रकार की होती है: एक स्वयं की स्वाभाविक स्थिति के अनुसार और दूसरी अभिप्राय के अनुसार. जब कोई इस जीवन के बारे में सच्चाई को समझता है लेकिन भौतिक संदूषण की पूरी तरह से सफाई नहीं करता है, तो वह तथ्यात्मक रूप से अलौकिक धाम, वृंदावन में स्थित नहीं है, हालांकि हो सकता है उसे आध्यात्मिक जीवन की समझ हो. हालाँकि, जब कोई भौतिक शरीर की काम वासना से मुक्त हो जाता है, तो वह परम धाम वृदावन तक पहुँच सकता है. जब कोई इस अवस्था में पहुँच जाए, तब वह काम-गायत्री और काम-बीज मंत्र का उच्चारण कर सकता है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "आत्म-बोध का विज्ञान", पृष्ठ 333 
अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), "भगवान चैतन्य, स्वर्ण अवतार की शिक्षाएँ", पृष्ठ 228 और 362 
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